जोहार छत्तीसगढ़ – धरमजयगढ़।
धरमजयगढ़ क्षेत्र में कोयला खदानों को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े होने लगे हैं। सवाल सिर्फ कोयला खनन का नहीं, बल्कि विरोध के अलग-अलग पैमाने को लेकर भी है। ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि जब किसी निजी कंपनी का कोल ब्लॉक आता है तो विरोध का स्वर तेज हो जाता है, लेकिन जब सरकारी उपक्रम एसईसीएल की खदान या विस्तार परियोजना सामने आती है तो वही तेवर दिखाई क्यों नहीं देते?
यह सवाल अब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि बांधापाली क्षेत्र में एसईसीएल की छाल खुली खदान के प्रस्तावित विस्तार को लेकर 29 सितंबर की जनसुनवाई निर्धारित होने की जानकारी सामने आई है।
ऐसे लोगों को रखना होगा आंदोलन से दूर
अब सवाल उठता है कि क्या बांधापाली विधायक लालजीत सिंह का विधानसभा से बहार है? क्या एसईसीएल का कोल ब्लॉक से पर्यावरण को नुकसान नहीं होता है? हाथी मेरा साथी का दम दिखाने वाले समाज सेवक बताए क्या बांधापाली कोल ब्लाक आने से हाथी की रहावास में को फ्रर्क नहीं पड़ेगा? ऐसे कई सवाल क्षेत्र के जनता के मन में घर बन बैंठे हैं। ग्रामीणों इन जनप्रतिनिधि और समाज सेवकों पर गंभीर आरोप लगाते हुए पूंछ रहे हैं कि एसईसीएल का विरोध करने से कुछ नहीं मिलेगा इसलिए बांधापाली और कुर्मीभौना कोल ब्लॉक विरोध नहीं किया जा रहे हंै क्या? कोल ब्लॉक से प्रभावित होने वालों को ऐसे लोगों को विरोध प्रदर्शन से दूर रखना होगा क्योंकि ये लोग एसईसीएल का विरोध इसलिए नहीं करते हैं कि ये कंपनी इनकी जेब गरम नहीं करते? और प्राइवेट कंपनी का जमकर विरोध इसलिए करते हैं कि ताकि इनको इनके हिसाब से सब कुछ मिले? इसलिए प्रभवितों को ध्यान रखना होगा कि ऐसे लोगों को विरोध से दूर रखे और कोल कंपनी का नियमानुसार विरोध करें ताकि जल जंगल जमीन सुरक्षित रहे।
पुरुंगा में विरोध का वह दौर अब भी चर्चा में
धरमजयगढ़ क्षेत्र के पुरुंगा में प्रस्तावित अडानी समूह से जुड़ी कोयला परियोजना के खिलाफ वर्ष 2025 में ग्रामीणों ने बड़े स्तर पर विरोध किया था। ग्रामीणों ने जनसुनवाई निरस्त करने की मांग को लेकर कलेक्टोरेट तक प्रदर्शन किया था। उस दौरान विधायक लालजीत सिंह राठिया सहित जनप्रतिनिधियों तथाकथित समाज सवेकों ने खुब हल्ला गुल्ल मचाया था। यानी निजी कंपनी से जुड़ी परियोजना को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध सामने आया। अब सवाल यह उठ रहा है कि एसईसीएल की परियोजनाओं को लेकर भी क्या उसी स्तर पर जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता प्रभावित ग्रामीणों के साथ खड़े होंगे? क्या सरकारी कंपनी के खनन से पर्यावरण पर असर नहीं पड़ता? यह सबसे बड़ा सवाल है। कोयला खनन चाहे निजी कंपनी करे या सरकारी उपक्रम, उसके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन परियोजना के आकार, भूमि उपयोग, वन क्षेत्र, जल स्रोत, विस्थापन और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। इसलिए अब समय है ग्रामीण जो कोयला खनन परियोजना से प्रभावित है ऐसे चेहरों को पहचान ले जो खदानों के लिए विरोध प्रदर्शन को अपने आय का जरिया बना रखें हैं जैसे सड़क और रेल परियोजना में भूमि अधिग्रहण पर मुआवजा राशि के नाम पर लोगों से लाखों रुपए कमा लिए हैं।








