छत्तीसगढ़

नेताओं की नेतागिरी गजब की, पहले शिकायत, फिर चुप्पी… अधिकारी-कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर गरमाई राजनीति, शिकायत के बाद अचानक खामोशी, क्या वार्डवासियों ने इसलिए चुना था अपना जनप्रतिनिधि?

जोहार छत्तीसगढ़-धरमजयगढ़।

धरमजयगढ़ में जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली को लेकर इन दिनों तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे वार्ड और क्षेत्र की समस्याओं को मजबूती से उठाएं, अधिकारियों-कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर नजर रखें और आम लोगों के हितों की आवाज बनें। लेकिन जब कोई जनप्रतिनिधि भ्रष्टाचार या अनियमितता का आरोप लगाकर शिकायत करता है और उसके बाद अचानक उसी मामले में चुप्पी साध लेता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर शिकायत के बाद हुआ क्या? धरमजयगढ़ में कुछ समय पहले एक जनप्रतिनिधि द्वारा अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यप्रणाली और कथित भ्रष्टाचार को लेकर शिकायत किए जाने की चर्चा खूब हुई थी। शिकायत के बाद उच्चाधिकारियों को ज्ञापन सौंपने, कार्यवाही नहीं होने पर आंदोलन करने बात सामने आई थी। उस समय ऐसा माहौल बना कि संबंधित मामले को लेकर जल्द ही बड़ी कार्यवाही होगी। चौक-चौराहों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस शिकायत की चर्चा होने लगी। जनता को उम्मीद थी कि जिस मामले को जनप्रतिनिधि ने गंभीरता से उठाया है, उसकी निष्पक्ष जांच होगी और जिम्मेदार लोगों पर कार्यवाही होगी। लेकिन समय बीतने के साथ ही मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में जाता दिखाई देने लगा। जिस शिकायत को लेकर शुरुआत में काफी सक्रियता दिखाई गई थी, उसी मामले में अब शिकायतकर्ता की ओर से पहले जैसी आवाज सुनाई नहीं दे रही है। न आंदोलन की बात आगे बढ़ी और न ही कार्यवाही को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी जनता के सामने आई।

शिकायत के बाद चुप्पी क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शिकायत में लगाए गए आरोप गंभीर थे, तो शिकायतकर्ता जनप्रतिनिधि ने उसके बाद मामले को आगे क्यों नहीं बढ़ाया? यदि आरोप गलत थे तो क्या शिकायत वापस ली गई? और यदि आरोप सही थे तो कार्यवाही की मांग को लेकर आगे कदम क्यों नहीं उठाए गए? जनता यह भी जानना चाहती है कि क्या संबंधित अधिकारियों से शिकायतकर्ता की बाद में कोई बातचीत या समझौता हुआ? यदि हुआ तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई या सिर्फ राजनीतिक प्रदर्शन?

जनप्रतिनिधि जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है तो जनता उसे गंभीरता और निरंतरता की उम्मीद करती है। केवल शिकायत करना, ज्ञापन देना और आंदोलन की चेतावनी देकर बाद में चुप हो जाना जनता के बीच कई तरह के सवाल खड़े करता है। यदि शिकायत वास्तव में जनहित में की गई थी तो उसकी जांच और अंतिम कार्यवाही तक मामला क्यों नहीं पहुंचा? सबसे गंभीर सवाल तब उठता है जब ऐसी चर्चाएं सामने आती हैं कि शिकायतकर्ता और जिन अधिकारी पर आरोप लगाए गए थे, उनके बीच बाद में नजदीकियां या कथित समझौते की स्थिति बनी।

वार्डवासियों के भरोसे का सवाल

जनता अपने प्रतिनिधि को केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं चुनती, बल्कि क्षेत्र की समस्याओं को मजबूती से उठाने और जनहित की लड़ाई लडऩे के लिए चुनती है। ऐसे में किसी गंभीर शिकायत के बाद अचानक चुप्पी जनता के भरोसे पर सवाल खड़ा करती है। वार्डवासी अब यह जानना चाहते हैं कि जिस मामले को लेकर इतना हंगामा हुआ था, उसका परिणाम क्या निकला? क्या जांच हुई? क्या आरोप सही पाए गए? क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी पर कार्यवाही हुई? अगर नहीं हुई तो इसके पीछे कारण क्या है? जनता के बीच चर्चा है कि शिकायत को उसके अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाना ही असली जनप्रतिनिधित्व है। अब देखना होगा कि संबंधित जनप्रतिनिधि इन सवालों का जवाब जनता के सामने रखते हैं या फिर यह मामला भी दूसरी शिकायतों की तरह समय के साथ खामोशी में दबकर रह जाएगा।

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