जोहार छत्तीसगढ़-धरमजयगढ़।
धरमजयगढ़ क्षेत्र में जमीन की हेराफेरी और अवैध खरीद-फरोख्त के मामलों को लेकर पुलिस द्वारा लगातार कार्यवाही की जा रही है। अलग-अलग मामलों में एफआईआर दर्ज होने के साथ कुछ लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है, जबकि कुछ आरोपी अग्रिम जमानत पर हैं। इन कार्यवाहीयों के बीच अब आबंटित जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़े मामलों में एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि यदि जमीन के लेन-देन में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो कार्यवाही केवल क्रेता और विक्रेता तक ही सीमित क्यों है? इस पूरी प्रक्रिया में शामिल रहे अधिकारी-कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच क्यों नहीं की जा रही है? मामला धरमजयगढ़ क्षेत्र के मेडरमार में हुई आबंटन जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़ा बताया जा रहा है। इस मामले में धरमजयगढ़ पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। जानकारी के अनुसार इनमें से दो लोगों को न्यायालय से अग्रिम जमानत मिल चुकी है, जबकि विक्रेता की पुलिस द्वारा तलाश की जा रही है।
जमीन खरीदने से पहले राजस्व रिकॉर्ड की होती है जांच
सामान्य तौर पर कोई व्यक्ति जमीन खरीदने से पहले संबंधित जमीन के दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड और जमीन की स्थिति की जानकारी लेता है। ग्रामीण क्षेत्रों में खरीदार अक्सर संबंधित हल्का पटवारी से जमीन के संबंध में जानकारी प्राप्त करता है। इसके बाद जमीन की खरीद-बिक्री की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। यदि जमीन की बिक्री के दौरान दस्तावेज तैयार हुए, सरकारी शुल्क जमा हुआ, रजिस्ट्री हुई और उसके बाद नामांतरण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नामांतरण की प्रक्रिया के दौरान संबंधित राजस्व अधिकारियों ने जमीन की वास्तविक स्थिति और उसके आबंटन संबंधी रिकॉर्ड की जांच किस स्तर तक की?
नामांतरण के समय क्यों नहीं रुका मामला?
सबसे बड़ा सवाल नामांतरण प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है। यदि संबंधित जमीन आबंटित भूमि थी और नियमानुसार उसकी खरीद-फरोख्त प्रतिबंधित थी, तो नामांतरण आवेदन प्रस्तुत किए जाने के समय राजस्व रिकॉर्ड में इसकी जानकारी सामने आनी चाहिए थी कि जमीन सरकारी या आबंटन है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि नामांतरण आवेदन पर कार्यवाही करने वाले अधिकारी के समक्ष जमीन की स्थिति से संबंधित कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे। क्या आबंटित जमीन होने की जानकारी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज थी? यदि दर्ज थी तो नामांतरण की प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ी? और गलत तरीके से नामांतरण करने वाले अधिकारी पर कब कार्यवाही होगी?
सिर्फ क्रेता-विक्रेता पर कार्यवाही से कई सवाल अनुत्तरित
जमीन की खरीद-बिक्री केवल के्रता और विक्रेता के बीच होने वाली प्रक्रिया नहीं होती। इसमें दस्तावेज तैयार करने, जमीन की स्थिति की जानकारी देने, रजिस्ट्री कराने और उसके बाद नामांतरण जैसी कई राजस्व प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि यदि मेडरमार के मामले में आबंटन जमीन की खरीद-फरोख्त नियम विरुद्ध पाई जाती है, तो सिर्फ क्रेता और विके्रता की भूमिका की जांच न कर, पूरी प्रक्रिया में शामिल संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
पटवारी और नामांतरण अधिकारी की भूमिका की जांच जरूरी
मामले में यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित हल्का पटवारी द्वारा जमीन की स्थिति के संबंध में क्या जानकारी दी गई थी। क्या जमीन के आबंटित होने की जानकारी पटवारी के रिकॉर्ड में थी? यदि थी तो खरीदार को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई? इसी तरह नामांतरण के समय संबंधित तहसील कार्यालय में प्रस्तुत दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड की जांच किस प्रकार की गई, इसकी भी पड़ताल आवश्यक है। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की, गलत जानकारी दी या नियम विरुद्ध प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए। अब क्षेत्रवासियों की नजर पुलिस जांच पर है। लोगों की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारी-कर्मचारियों पर भी पुलिस कार्यवाही करें।








