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जोहार छत्तीसगढ़ – धरमजयगढ़।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने धर्मजयगढ़ निवासी एवं पत्रकार विवेक कुमार पाण्डेय द्वारा दायर जनहित याचिका (डब्ल्यूपीपीआईएल क्रमांक 33/2026) को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि ग्राम भालुपखना में मांड नदी पर 7.5 मेगावाट की लघु जलविद्युत परियोजना का निर्माण कर रही धनवाड़ा पावर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा खसरा क्रमांक 347 एवं 365 की वन भूमि पर वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा-2 के तहत आवश्यक अनुमति लिए बिना गैर-वन गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। याचिकाकर्ता ने परियोजना पर रोक लगाने, यथास्थिति बनाए रखने तथा स्वतंत्र जांच समिति गठित करने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने न्यायालय को बताया कि शिकायत मिलने के बाद राजस्व एवं वन विभाग के अधिकारियों ने कई बार संयुक्त निरीक्षण किया। 23 मार्च 2026 तथा 20 जून 2026 को तैयार पंचनामों एवं जांच रिपोर्टों में स्पष्ट पाया गया कि विवादित भूमि पर किसी प्रकार का विद्युत संयंत्र, पेनस्टॉक, स्विचयार्ड अथवा अन्य निर्माण नहीं किया गया है और वहां कोई गैर-वन गतिविधि संचालित नहीं हो रही है।
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि संबंधित खसरा भूमि राजस्व अभिलेखों में राजस्व भूमि के रूप में दर्ज है तथा परियोजना के किसी भी हिस्से का निर्माण उक्त भूमि पर नहीं किया गया। कंपनी की ओर से भी न्यायालय को बताया गया कि परियोजना का निर्माण सभी सक्षम अधिकारियों से प्राप्त स्वीकृतियों एवं नियमों के अनुरूप किया गया है और कानून का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि केवल समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों या पुराने पत्राचार के आधार पर जनहित याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। उपलब्ध आधिकारिक जांच रिपोर्टों से याचिकाकर्ता के आरोपों की पुष्टि नहीं होती। अदालत ने यह भी माना कि संबंधित विभागों ने शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई करते हुए कई बार जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत की है।
खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता यह सिद्ध नहीं कर सके कि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 अथवा किसी अन्य वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन किया गया है। इसलिए जनहित याचिका में मांगी गई राहत प्रदान करने का कोई आधार नहीं बनता।
अदालत ने जनहित याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया तथा याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई जमानत राशि भी जब्त करने का आदेश दिया।








