छत्तीसगढ़

कोल ब्लॉक विरोध में स्वार्थी तत्वों से सावधान रहने की जरूरत … आंदोलन जल-जंगल-जमीन बचाने का है या कुछ लोगों के निजी स्वार्थ का? प्रभावित ग्रामीणों को खुद तय करनी होगी आंदोलन की दिशा

 

जोहार छत्तीसगढ़ – धरमजयगढ़।

धरमजयगढ़ क्षेत्र में प्रस्तावित कोल ब्लॉक को लेकर ग्रामीणों का विरोध लगातार तेज होता दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता उनकी जमीन, जंगल, आजीविका और वर्षों से बसे आशियाने को लेकर है। कोयला खदानों के संभावित प्रभाव को देखते हुए ग्रामीण अपने अधिकारों और भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन इसी आंदोलन के बीच अब एक दूसरा सवाल भी उठने लगा है। क्या ग्रामीणों के इस संघर्ष में ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनका उद्देश्य जनहित से ज्यादा अपना निजी स्वार्थ पूरा करना है? ग्रामीणों के बीच यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि भोले-भाले और कम पढ़े-लिखे ग्रामीणों को बड़ी-बड़ी बातें बताकर आंदोलन में आगे किया जाता है और कुछ लोग स्वयं आंदोलन के नाम पर अपनी पहचान और संस्थाओं को मजबूत करने में जुटे रहते हैं। यदि किसी आंदोलन में आर्थिक सहयोग, संस्था की भूमिका अथवा फंडिंग जुड़ी हुई है तो उसकी पारदर्शिता सामने आना बेहद जरूरी है।

आंदोलन ग्रामीणों का है तो, नेतृत्व ग्रामीणों के हाथ में क्यों नहीं?

जल, जंगल और जमीन की लड़ाई सबसे ज्यादा उस व्यक्ति की है, जिसकी जमीन प्रभावित होने जा रही है। ऐसे में आंदोलन की प्राथमिकता भी प्रभावित परिवारों की आवाज होनी चाहिए। बाहरी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं अथवा एनजीओ की भूमिका यदि है तो वह स्पष्ट और पारदर्शी होनी चाहिए। किस संस्था को किस स्रोत से सहयोग मिल रहा है, आंदोलन में उसकी भूमिका क्या है और वह ग्रामीणों के हित में किस प्रकार काम कर रही है, इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए। क्योंकि आंदोलन किसी व्यक्ति, संस्था या संगठन की निजी संपत्ति नहीं है। यह प्रभावित ग्रामीणों के भविष्य का सवाल है।

कोल ब्लॉक विरोध के मंच पर एनजीओ के फ्लेक्स क्यों?

आंदोलन के दौरान यदि मुख्य मुद्दा कोल ब्लॉक और उससे प्रभावित होने वाले जल-जंगल-जमीन का है, तो मंच और प्रचार सामग्री में भी इसी मुद्दे को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अलग-अलग संस्थाओं के प्रचारात्मक फ्लेक्स, बैनर अथवा व्यक्तिगत प्रचार को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।विशेषकर यदि किसी एनजीओ या संस्था की ओर से आंदोलन में आर्थिक सहयोग लिया जा रहा है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। किससे कितना सहयोग मिला और उसका उपयोग कहां हुआ, इसका हिसाब ग्रामीणों के सामने होना चाहिए। सिर्फ फोटो, वीडियो और सोशल मीडिया प्रचार से आंदोलन मजबूत नहीं होता। आंदोलन मजबूत होता है ईमानदारी, पारदर्शिता और प्रभावित लोगों की एकजुट आवाज से।

‘हाथी मेरा साथी’ के नाम पर, मुद्दा भटकना नहीं चाहिए

कोल ब्लॉक विरोध का आंदोलन यदि जल-जंगल-जमीन बचाने के लिए है तो उसके केंद्र में प्रभावित गांव, किसान, आदिवासी परिवार, वन और उनकी आजीविका होनी चाहिए। दूसरे मुद्दों या संस्थागत प्रचार को आंदोलन के मूल उद्देश्य पर हावी नहीं होने दिया जाना चाहिए। ग्रामीणों को यह समझने की जरूरत है कि किसी भी आंदोलन में शामिल हर व्यक्ति या संस्था को केवल उसके नारे और दावे के आधार पर अपना प्रतिनिधि मान लेना उचित नहीं है। कौन वास्तव में ग्रामीणों के साथ खड़ा है और कौन सिर्फ कैमरे के सामने दिखाई दे रहा है, इसका फैसला ग्रामीणों को स्वयं करना होगा।

कंपनी का विरोध हो तो पारदर्शिता भी जरूरी

कोल कंपनियों के खिलाफ आंदोलन करने वाले लोगों से भी उतने ही सवाल पूछे जाने चाहिए, जितने कंपनी से पूछे जाते हैं। यदि कंपनी से ग्रामीणों की जमीन, मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार और पर्यावरण को लेकर सवाल किए जा रहे हैं, तो आंदोलन का नेतृत्व करने वालों से भी पूछा जाना चाहिए कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं और उनकी आर्थिक व्यवस्था क्या है।

जनहित की जनहित की लड़ाई में पारदर्शिता एकतरफा नहीं हो सकती

यदि कोई व्यक्ति या संस्था ग्रामीणों के नाम पर आर्थिक लाभ प्राप्त कर रही है, तो उसका हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए। इससे आंदोलन की विश्वसनीयता बढ़ेगी और वास्तविक संघर्ष करने वाले ग्रामीणों पर उठने वाले सवाल भी खत्म होंगे।

प्रभावित लोगों की आवाज सबसे ऊपर हो

कोल ब्लॉक के वास्तविक प्रभावित परिवारों को आंदोलन में सबसे आगे रखना जरूरी है। जिनकी जमीन जाएगी, जिनके जंगल प्रभावित होंगे, जिनके गांव विस्थापन के खतरे में आएंगे और जिनकी आजीविका पर असर पड़ेगा, निर्णय लेने में सबसे बड़ी भूमिका उन्हीं की होनी चाहिए। बाहरी लोगों की भूमिका यदि सहयोग तक सीमित और पारदर्शी है तो उस पर ग्रामीण स्वयं निर्णय लें, लेकिन किसी भी बाहरी व्यक्ति को आंदोलन की दिशा तय करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।

आंदोलन किसी व्यक्ति का नहीं, आने वाली पीढ़ियों का सवाल

धरमजयगढ़ की जमीन और जंगल केवल आज की पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं। आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी इससे जुड़ा है। इसलिए कोल ब्लॉक का विरोध करना है तो वह नारे, फोटो और प्रचार से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, कानूनी अधिकारों, प्रभावित परिवारों की एकजुट के साथ होना चाहिए। ग्रामीणों को भी सजग रहना होगा कि कोई उनकी मजबूरी और भावनाओं का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत या संस्थागत हित के लिए न कर सके। जल-जंगल-जमीन बचाने की लड़ाई में सबसे पहले स्वार्थ को बाहर करना होगा। आंदोलन की कमान प्रभावित ग्रामीणों के हाथ में होगी, तभी उसकी आवाज मजबूत और विश्वसनीय होगी। अब सवाल सिर्फ कोल ब्लॉक का विरोध करने का नहीं है, सवाल यह भी है कि इस विरोध की दिशा कौन तय कर रहा है और आखिर किसके हित में?

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts