जोहार छत्तीसगढ़ – धरमजयगढ़।
धरमजयगढ़ नगर पंचायत के वार्डों में विकास कार्यों की स्थिति को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकार द्वारा वार्डों की मूलभूत सुविधाओं और विकास कार्यों के लिए पार्षदों को मिलने वाली पार्षद निधि का आखिर इस्तेमाल कहां और किस काम में हुआ, इसे लेकर नगरवासियों में चर्चा तेज हो गई है। लाखों रुपये की निधि जारी होने के बावजूद कई वार्डों में सड़क, नाली, पानी, सफाई और अन्य मूलभूत सुविधाओं की स्थिति जस की तस बनी हुई है। जानकारी के अनुसार नगर पंचायत में कुल 15 वार्ड हैं और प्रत्येक पार्षद के लिए प्रतिवर्ष 3 लाख रुपये की पार्षद निधि का प्रावधान है। इस हिसाब से एक वर्ष में सभी 15 वार्डों के लिए 45 लाख रुपये की राशि उपलब्ध होती है। यदि दो वर्षों की निधि को आधार माना जाए तो यह राशि 90 लाख रुपये तक पहुंचती है। ऐसे में नगरवासियों का सीधा सवाल है कि इतनी बड़ी राशि से वार्डों में आखिर कितने और कौन-कौन से विकास कार्य कराए गए?
कागजों में विकास या जमीन पर?
पार्षद निधि का उद्देश्य वार्ड की छोटी-बड़ी मूलभूत जरूरतों को पूरा करना है। पार्षदों की अनुशंसा के आधार पर वार्ड में आवश्यक विकास कार्य कराए जाने चाहिए। लेकिन धरमजयगढ़ के वार्डों में आज भी नागरिक मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं। कहीं नालियों की समस्या है तो कहीं सड़क और जल निकासी की परेशानी। कई स्थानों पर साफ-सफाई और अन्य नागरिक सुविधाओं को लेकर भी लोगों को शिकायतें हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब विकास के लिए लगातार निधि उपलब्ध कराई गई, तो उसका असर वार्डों में दिखाई क्यों नहीं दे रहा?
जनता पूछ रही पार्षद निधि से हुआ क्या?
नगरवासियों का कहना है कि यदि पार्षद निधि से वार्डों में कार्य कराए गए हैं, तो उनकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। प्रत्येक वार्ड में कितनी राशि मिली, किस कार्य के लिए स्वीकृत हुई, कार्य की लागत कितनी थी, काम कब हुआ और वर्तमान में उसकी स्थिति क्या है, इन सभी सवालों का जवाब जनता को मिलना चाहिए। नगर में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि सरकार ने वार्ड के विकास के लिए पैसा दिया, लेकिन क्या वास्तव में उसका लाभ वार्ड की जनता को मिला? या फिर विकास कार्यों के नाम पर कागजी खानापूर्ति कर निधि को ठिकाने लगाया गया?
पार्षद निधि की हो निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच
नगरवासियों ने स्थानीय प्रशासन से मांग की है कि पिछले दो वर्षों में जारी पार्षद निधि की वार्डवार और कार्यवार जांच कराई जाए। प्रत्येक पार्षद द्वारा अनुशंसित कार्यों की स्वीकृति, भुगतान, निर्माण और मौके पर वास्तविक स्थिति का भौतिक सत्यापन कराया जाए। यदि जांच में नियमों की अनदेखी, फर्जी कार्य, अधिक भुगतान, घटिया निर्माण या सरकारी राशि के दुरुपयोग जैसी अनियमितताएं सामने आती हैं, तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाए। जनता का पैसा जनता के विकास के लिए है। इसलिए अब सवाल सिर्फ तीन लाख रुपये प्रति पार्षद का नहीं, बल्कि लगभग 90 लाख रुपये की दो वर्षों की संभावित निधि के उपयोग और उसके परिणाम का है।








