जोहार छत्तीसगढ़-धरमजयगढ़।
रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत बायसी कॉलोनी के आश्रित ग्राम मेडरमार कॉलोनी से मुख्य सड़क तक मनरेगा के तहत कराए गए वृक्षारोपण कार्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से कराए गए इस कार्य में लाखों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद मौके पर लगाए गए पौधों का अस्तित्व नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में ग्रामीणों द्वारा कार्य की गुणवत्ता और खर्च की गई राशि को लेकर जांच की मांग की जा रही है। सरकार द्वारा हर वर्ष पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसके तहत विभिन्न ग्राम पंचायतों में मनरेगा सहित अन्य योजनाओं से पौधरोपण कराया जाता है। पौधों की सुरक्षा, सिंचाई और देखरेख के लिए भी राशि का प्रावधान रहता है। लेकिन धरातल पर यदि लगाए गए पौधे ही सुरक्षित नहीं रह पाए तो सरकारी राशि खर्च करने का उद्देश्य कितना पूरा हुआ, यह बड़ा सवाल है।
करीब 100 पौधे, लेकिन एक भी पौधा जीवित नहीं होने का दावा
जानकारी के अनुसार मेडरमार कॉलोनी से मुख्य सड़क तक मनरेगा के तहत वृक्षारोपण कार्य कराया गया था। स्थानीय स्तर पर बताया जा रहा है कि सड़क किनारे मुश्किल से करीब 100 पौधे लगाए गए थे। ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान में इन पौधों में से एक भी पौधा जीवित नजर नहीं आ रहा है।
इस कार्य में मजदूरी और सामग्री मद में लाखों रुपये खर्च किए जाने की बात सामने आ रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक कार्य में श्रमिक व्यय के रूप में करीब 3 लाख 1 हजार 600 रुपये तथा सामग्री मद में करीब 63 हजार 800 रुपये, यानी कुल लगभग 3 लाख 65 हजार 400 रुपये खर्च होने की बात कही जा रही है।वहीं, कार्य की प्रशासकीय स्वीकृति राशि 2 लाख 73 हजार 600 रुपये बताए जाने से खर्च और स्वीकृति राशि के आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इन दोनों आंकड़ों में अंतर क्यों है, इसका स्पष्ट जवाब संबंधित विभागीय रिकॉर्ड और जांच के बाद ही सामने आ सकता है।
हर साल पौधरोपण, फिर भी नजर नहीं आते पेड़
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि हर वर्ष बारिश के मौसम में बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चलाया जाता है। सरकारी रिकॉर्ड में बड़ी संख्या में पौधे लगाए जाने की जानकारी दर्ज होती है, लेकिन कुछ समय बाद मौके पर पौधे दिखाई नहीं देते।
ग्रामीणों का सवाल है कि यदि हर साल लगाए जाने वाले पौधों में से अधिकांश पौधे जीवित रह जाएं तो कुछ वर्षों में गांवों और मुख्य मार्गों के आसपास हरियाली बढ़नी चाहिए। लेकिन वास्तविक स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है।
पौधों की सुरक्षा और देखरेख पर भी सवाल
वृक्षारोपण के बाद पौधों को जीवित रखने के लिए उनकी नियमित सिंचाई, सुरक्षा और देखरेख आवश्यक होती है। पौधों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था की गई थी? कितने पौधे लगाए गए? पौधों की देखरेख के लिए कितनी राशि खर्च की गई? कार्य की जियो-टैगिंग और मस्टर रोल में कितने श्रमिक दर्ज हैं? सामग्री की खरीदी कहां से हुई? इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी बताई जा रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि मौके पर एक भी पौधा जीवित नहीं है तो इस पूरे कार्य की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, इन आरोपों की वास्तविकता सरकारी दस्तावेजों और स्थल निरीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
जांच हुई तो सामने आ सकती है वास्तविकता
मेडरमार कॉलोनी से मुख्य सड़क तक कराए गए इस वृक्षारोपण कार्य की प्रशासकीय स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, मस्टर रोल, सामग्री भुगतान, पौधों की संख्या, जियो-टैग फोटो, पौधों की सुरक्षा एवं रखरखाव से संबंधित रिकॉर्ड की जांच की मांग उठ रही है।
ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्थल निरीक्षण करें और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पौधों की संख्या तथा वास्तविक स्थिति का मिलान करें। यदि जांच में अनियमितता या सरकारी राशि के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए और सरकारी राशि की वसूली की जाए। अब देखना होगा कि वृक्षारोपण के नाम पर खर्च हुई लाखों रुपये की राशि और मौके पर गायब पौधों के मामले में प्रशासन जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या मामला सरकारी रिकॉर्ड तक ही सीमित रह जाता है।








