जोहार छत्तीसगढ़–धरमजयगढ़।
धरमजयगढ़ हल्का नंबर 1 में वन अधिकार एवं राजस्व अभिलेखों से जुड़ा एक अत्यंत गंभीर और संदिग्ध मामला सामने आया है, जिसने पूरे भूमि रिकॉर्ड तंत्र, दस्तावेजों के सत्यापन और रजिस्ट्री प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़े और कड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1990-91 में वन व्यवस्थापन के तहत संतराम पिता रांगीराम को खसरा नंबर 313 रकबा 1.450 हेक्टेयर तथा खसरा नंबर 349 रकबा 0.550 हेक्टेयर, कुल 2.000 हेक्टेयर भूमि का पट्टा प्रदान किया गया था। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि वर्तमानl अधिकार अभिलेख एवं राजस्व रिकॉर्ड में उक्त दोनों खसरा नंबरों का कोई स्पष्ट उल्लेख ही नहीं है। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है, तो यह न केवल राजस्व अभिलेखों की गंभीर लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि पूरी भूमि की वैधता और आगे हुई रजिस्ट्री प्रक्रिया को भी कटघरे में खड़ा करता है। जानकारी के अनुसार 21 दिसंबर 2021 को संतराम पिता रांगीराम की ओर से पदमन पटेल पिता मनबोध पटेल के माध्यम से एक आम मुख्तियारनामा निष्पादित किया गया। वहीं खरीदार पक्ष की ओर से डॉ. महेन्द्र प्रसाद सामल पिता गुरु प्रसाद सामाल, निवासी सरकांडा, बिलासपुर के प्रतिनिधि के रूप में रोहित कुमार विशाल, जाति कोलता, निवासी सराईपाली, लखनपुर, जिला झारसुगुड़ा, ओडिशा द्वारा उक्त भूमि का क्रय किए जाने का उल्लेख सामने आया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि संबंधित खसरा नंबर वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड एवं अधिकार अभिलेख में दर्ज ही नहीं थे, तो आखिर किस आधार पर आम मुख्तियारनामा तैयार किया गया और उसके बाद भूमि की रजिस्ट्री कैसे संपन्न हो गई? क्या दस्तावेजों के पंजीयन से पहले संबंधित भूमि का राजस्व रिकॉर्ड, वन अधिकार की स्थिति तथा स्वामित्व संबंधी अभिलेखों का विधिवत सत्यापन किया गया था? यदि सत्यापन नहीं हुआ, तो यह प्रक्रिया किस स्तर पर हुई और इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी या संबंधित पक्ष की बनती है? भूमि से जुड़े मामलों में सामान्यतः राजस्व अभिलेखों, अधिकार रिकॉर्ड तथा अन्य आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि रिकॉर्ड में विसंगति होने के बावजूद दस्तावेजों का निष्पादन और पंजीयन हुआ है, तो यह जांच का विषय बन सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित भूमि की वास्तविक कानूनी स्थिति क्या थी, रजिस्ट्री प्रक्रिया के दौरान किन दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई की गई तथा कहीं किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी तो नहीं हुई। फिलहाल इस मामले में संबंधित विभागों की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों एवं पक्षों की जवाबदेही भी तय की जा सकती है। अब सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठ रहा है किl जब संबंधित खसरा नंबर राजस्व रिकॉर्ड और अधिकार अभिलेख में दर्ज ही नहीं थे, तो आखिर किस आधार पर आम मुख्तियारनामा तैयार किया गया और उससे भी आगे बढ़कर भूमि की रजिस्ट्री कैसे कर दी गई? क्या पंजीयन से पहले भूमि की वैधानिक स्थिति, वन अधिकार रिकॉर्ड और राजस्व अभिलेखों का अनिवार्य सत्यापन किया गया था या नहीं? यदि नहीं किया गया, तो यह घोर लापरवाही किस स्तर पर हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है? भूमि पंजीयन जैसे संवेदनशील मामलों में राजस्व अभिलेखों, वन अधिकार रिकॉर्ड और स्वामित्व दस्तावेजों का कठोर सत्यापन अनिवार्य माना जाता है, लेकिन इस मामले में सामने आ रही विसंगतियां पूरी प्रक्रिया की गंभीर खामियों की ओर इशारा कर रही हैं। यदि बिना वैध रिकॉर्ड के दस्तावेजों का निष्पादन और पंजीयन हुआ है, तो यह सीधे-सीधे नियमों की अनदेखी और संभावित अनियमितता का मामला बन सकता है।








