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छत्तीसगढ़ में राज्यसभा प्रतिनिधित्व पर गहराता विमर्श, उरांव समाज की उपेक्षा, धर्मांतरण और राजनीतिक भागीदारी बना प्रमुख मुद्दा

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जोहार छत्तीसगढ़-धरमजयगढ़।

छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के लिए दो सदस्यों का कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को पूर्ण होने जा रहा है। इसके साथ ही राज्य की राजनीति में सामाजिक संतुलन, जनजातीय प्रतिनिधित्व और विशेष रूप से उरांव समाज की भागीदारी को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। यह केवल एक संसदीय चयन नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश और राजनीतिक दिशा तय करने का अवसर भी माना जा रहा है।
जनसंख्या बनाम प्रतिनिधित्व का सवाल
जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ की कुल आबादी का लगभग 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अनुसूचित जनजातियों का है। इनमें गोंड, कंवर और उरांव प्रमुख समुदाय हैं।

* गोंड़ समाज को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मिल चुका है।
* कंवर समाज को लोकसभा में अवसर प्राप्त हुआ है।
* किंतु उरांव समाज, जो जनसंख्या की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है, लंबे समय से संसद के दोनों सदनों में प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व से वंचित रहा है।
यही असंतुलन अब सामाजिक चर्चा का केंद्र बन गया है। उरांव समाज के कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि संख्या में मजबूत होने के बावजूद नीति-निर्माण के मंचों पर उनकी उपस्थिति नगण्य है।

सत्ता और संगठन में सीमित भागीदारी

उरांव समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि राज्य सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर उरांव समाज की भागीदारी अपेक्षित स्तर पर नहीं है। निगम, मंडल, आयोग और अन्य शासकीय संस्थाओं में भी पर्याप्त अवसर नहीं मिले। पार्टी संगठन के शीर्ष दायित्वों में भी उरांव समाज की उपस्थिति सीमित दिखाई देती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि किसी भी समाज की वास्तविक भागीदारी केवल चुनावी टिकट देने तक सीमित नहीं होती, बल्कि संगठनात्मक संरचना और निर्णय-प्रक्रिया में उसकी भूमिका से तय होती है। जब समाज को नीति-निर्माण में स्थान नहीं मिलता, तो उपेक्षा की भावना स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है।
धर्मांतरण सामाजिक बिखराव की पीड़ा
उरांव समाज के भीतर धर्मांतरण का मुद्दा सबसे अधिक संवेदनशील बन चुका है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि आर्थिक अभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा सामाजिक असुरक्षा के कारण उरांव समाज का एक वर्ग ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हो रहा है। इससे पारंपरिक सरना आस्था, प्रकृति-पूजा, ग्राम देवालय और सामुदायिक अनुष्ठानों व तीज त्यौहारों में सहभागिता कम होती जा रही है।
परिवारों और गांवों में वैचारिक विभाजन बढ़ रहा है, जिससे सामाजिक एकता प्रभावित हो रही है।
बुजुर्गों का कहना है कि विवाह, त्योहार और पारंपरिक पर्वों में पहले जैसी सामूहिकता नहीं रही। यह केवल धार्मिक परिवर्तन का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व और पहचान का विषय बन गया है।

विश्लेषकों का मत है कि यदि उरांव समाज को राजनीतिक मंच पर प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले, तो वह धर्मांतरण जैसे विषय पर संतुलित और संवेदनशील नीति-चर्चा कर सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर बढ़ाने हेतु विशेष योजनाओं की मांग कर सकता है। सांस्कृतिक संरक्षण के लिए संस्थागत उपायों को आगे बढ़ा सकता है।

राजनीतिक समीकरण और संभावनाएं

उरांव समाज को लंबे समय से भाजपा का परंपरागत समर्थक वर्ग माना जाता रहा है। ऐसे में समाज के भीतर उठ रही उपेक्षा की भावना पार्टी के लिए भी चिंतन का विषय बन सकती है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि इस बार राज्यसभा के लिए उरांव समाज से राजनीतिक गलियारों में उरांव समाज से जुड़े कुछ नाम चर्चा में हैं, जिनमें प्रमुख हैं। जिला जशपुर से गणेश राम भगत, डॉ. बी.एल. भगत, जिला रायगढ़ से पनतराम भगत, जिला सरगुजा से बंसीधर उरांव, डॉ. आजाद भगत अगर भाजपा युवा वर्ग में भी राज्यसभा के लिए अवसर देना चाहती है तो भाजपा की विचारधार प्रति समर्पित युवाओं की कमी नहीं है, जिसमें रवि भगत लैलूंगा, वेदप्रकाश भगत फरसाबहार, बलराम भगत दोकड़ा, इंदर भगत अंबिकापुर, दिलमन मिंज जशपुर।

इनके सक्रियता व अनुभवी से उरांव समाज और संगठन को लाभ मिलेगा

* सामाजिक संतुलन का संदेश जाएगा।
* धर्मांतरण (डी लिस्टिंग)और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय मंच मिलेगा।
* जनजातीय क्षेत्रों के विकास पर केंद्रित नीति-निर्माण को गति मिल सकती है।

निर्णायक क्षण

राज्यसभा का आगामी चयन केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक समावेशन की कसौटी भी माना जा रहा है। अब प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व उरांव समाज को सर्वोच्च पंचायत में प्रतिनिधित्व देकर वर्षों से चली आ रही उपेक्षा की भावना को दूर करने का प्रयास करेगा, या फिर यह मुद्दा आगे भी विमर्श का विषय बना रहेगा। छत्तीसगढ़ की जनजातीय राजनीति में यह क्षण आने वाले समय की दिशा तय कर सकता है?

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