छत्तीसगढ़

सरना और ईसाई दोनों एक ही मां के कोख से जन्मे, फिर जल-जंगल-जमीन की लड़ाई में कौन किसके साथ?

 

जोहार छत्तीसगढ़ – विशेष समाचार

विस्थापन, पलायन और जल-जंगल-जमीन के मुद्दे पर आदिवासी समाज के बीच एकजुटता की अपील झारखंड में आदिवासी समाज के अधिकारों, पहचान और अस्तित्व को लेकर एक बार फिर बहस तेज होती नजर आ रही है। सरना और ईसाई समुदाय के बीच धार्मिक पहचान को लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन दोनों समुदायों की जड़ें, सामाजिक परंपराएं और जमीन से जुड़ी समस्याएं कई मामलों में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब बात आदिवासी अधिकारों, विस्थापन और जल-जंगल-जमीन की आती है, तो समाज की एकजुटता कितनी जरूरी है? बरखा लकड़ा ने सोशल बताए की सरना और ईसाई समुदाय को एक ही मां की संतान बताते हुए विस्थापन, पलायन और मानव तस्करी के खिलाफ संघर्ष करने का आह्वान किया गया है। आदिवासी समाज से अपने प्राकृतिक संसाधनों, पारंपरिक भूमि और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए एकजुट होने की अपील की गई है।

विस्थापन और पलायन बना गंभीर सवाल

झारखंड सहित देश के कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं, औद्योगिक गतिविधियों और विकास कार्यों के कारण भूमि अधिग्रहण एवं विस्थापन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। अपनी जमीन से बेदखल होने का खतरा, रोजगार की कमी और आजीविका के सीमित साधन कई परिवारों को पलायन के लिए मजबूर कर सकते हैं। वहीं, मानव तस्करी जैसी समस्या भी कमजोर और असुरक्षित वर्गों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है।

धर्म से ऊपर उठकर अधिकारों की लड़ाई जरूरी?

सरना समुदाय की अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जबकि ईसाई आदिवासियों की धार्मिक पहचान अलग है। इसके बावजूद जमीन, शिक्षा, रोजगार, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों जैसे मुद्दे दोनों समुदायों के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में धार्मिक मतभेदों के बजाय साझा समस्याओं पर संवाद और सहयोग को प्राथमिकता देने की जरूरत महसूस की जा रही है।

घर वापसी के साथ जमीन वापसी का सवाल भी अहम

पोस्टर में घर वापसी का नारा देते हुए एक बड़ा सवाल उठाया गया है—यदि लोग अपनी पारंपरिक पहचान और समाज की ओर लौटते हैं, तो क्या उनकी छीनी गई जमीन भी वापस मिलेगी? यह सवाल आदिवासी अधिकारों की बहस को धार्मिक पहचान से आगे बढ़ाकर भूमि अधिकार, पुनर्वास और न्याय तक ले जाता है। बड़ा सवाल यह है कि आदिवासी समाज की एकता केवल नारों तक सीमित रहेगी या विस्थापन, पलायन, मानव तस्करी और जमीन से जुड़े मुद्दों पर भी ठोस पहल होगी? जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए सामाजिक एकजुटता के साथ-साथ कानून के तहत अधिकारों की मांग, पारदर्शी पुनर्वास और प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाने की दिशा में प्रयास जरूरी हैं।

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