छत्तीसगढ़

निर्धनता और दरिद्रता में है अंतर-आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी भागवत कथा के अंतिम दिवस की कथा में स्यमंतक मणि,सुदामा चरित्र सहित अनेक प्रसंगों का किया गया वर्णन

जोहार छत्तीसगढ़-खरसिया।
अजित सिंह नगर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के अंतिम दिवस कथा स्थल भक्तिमय वातावरण देखने को मिला वहीं व्यासपीठ पर आसीन आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी महाराज के द्वारा अपने मुखारविंद से उपस्थित श्रोताओं को भागवत कथा के विभिन्न प्रसंगों का रसपान कराया। गर्ग परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में व्यासपीठ से आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी महाराज ने स्यमन्तक मणि की कथा में सत्य के बारे में बताया कि सत्य को छिपाया जा सकता है लेकिन मिटाया नहीं जा सकता है। सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति परेशान हो सकता है परंतु उसको पराजित नहीं किया जा सकता है। साधारण व्यक्ति की क्या कहें भगवान पर भी स्यमन्तक मणि को चुराने का कलंक लगा था। सत्राजित ने अपनी शंका के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण पर मणि चोरी करने और प्रसेन की हत्या करने का आरोप लगा दिया। श्रीकृष्ण ने मणि खोजकर सत्राजित को दे दी और खुद का निर्दोष साबित किया।

आचार्य ने कथा में बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने भौमासुर का संहार करके सोलह हजार एक सौ कन्याओं को उसके बंधन से मुक्त करके उनका वरण किया। ऊषा अनुरुद्ध विवाह की सुंदर कथा का एवं द्विविध नामक वानर का बलराम जी महाराज के द्वारा बध की कथा का विस्तार से वर्णन किया। भीम और जरासंध के युद्ध की और जरासंध के जन्म की कथा का वर्णन किया। सुदामा चरित्र की कथा में आचार्य ने कहा कि निर्धनता और दरिद्रता में बहुत अंतर है। सुदामा जी निर्धन हो सकते हैं परंतु वे दरिद्र नहीं है। भगवान अपने भक्तों पर कैसे कृपा करते हैं, गरीब और धनवान का भेद उनके द्वारा नहीं किया जाता है यह बात सुदामा चरित्र के प्रसंग से स्पष्ट होती है। आचार्य ने बताया भगवान लोगों के बीच उनकी वित्तीय स्थिति के आधार पर अंतर नहीं करते हैं और वे हमेशा भक्ति को पुरस्कृत करते हैं। इसके द्वारा सिखाया गया एक और नैतिक तथ्य यह है कि जीवन में कभी भी कुछ भी नि:शुल्क की आशा न करें; भगवान आपके अच्छे कर्मों के लिए उचित फल प्रदान करेंगे। एक और नीति बदले में किसी वस्तु के लिए भक्ति का व्यापार नहीं करना चाहिए। सुदामा ने श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांगा। दरिद्र होने के पश्चात् भी सुदामा ने श्रीकृष्ण को वह सब कुछ दिया जो उनके पास था (पोहा); बदले में, भगवान ने सुदामा को उनकी आवश्यकता की हर वस्तु दी। श्रीकृष्ण सच्चे व्यक्तियों को कैसे पुरस्कृत करते हैं, इस बारे में एक सबक भी है। श्रीकृष्ण ने सुदामा को केवल मित्र होने के कारण पुरस्कृत नहीं किया। सुदामा ने अपना सारा समय और प्रयास एक सच्चे व्यक्ति के लिए सांस्कृतिक प्रयासों में लगाया, जिससे समझा जा सकता है कि वह आर्थिक रूप से समृद्ध क्यों नहीं थे। इसमें धर्म की शिक्षा, नैतिक कर्तव्य और समाज में आध्यात्मिकता का प्रसार शामिल था। यह इस प्रयास के लिए है कि कृष्ण सुदामा के परिवार को धन से पुरस्कृत करते हैं ताकि सुदामा उस कार्य को जारी रख सकें। कथा के दौरान पूरा पंडाल भक्तिरस से सरोबार था और श्रद्धालु भाव विभोर होकर भागवत कथा का रसपान कर रहे थे।

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