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पुरुंगा में अदानी की भूमिगत कोयला खदान से बढ़ी ग्रामीणों की चिंता, विकास के नाम पर उजडऩे का डर …जमीन के नीचे कोयला निकालने की तैयारी, लेकिन ग्रामीणों के सामने जमीन, पानी, खेती और भविष्य का सवाल — परियोजना को लेकर विरोध के स्वर तेज
जोहार छत्तीसगढ़-धरमजयगढ़।
रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ विकासखंड के ग्राम पुरुंगा में प्रस्तावित अदानी की भूमिगत कोयला खदान को लेकर ग्रामीणों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। खदान शुरू होने से क्षेत्र में रोजगार और विकास के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर ग्रामीणों के सामने अपनी जमीन, खेती, जलस्रोत, पर्यावरण और आने वाली पीढिय़ों के भविष्य को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कोयला जमीन के नीचे है, लेकिन उसका असर केवल जमीन के नीचे तक सीमित नहीं रहेगा। भूमिगत खनन के कारण जमीन के अंदर लगातार गतिविधियां होने से भविष्य में भूमि धंसने, खेतों की उत्पादकता प्रभावित होने, जलस्तर में बदलाव और प्राकृतिक जलस्रोतों पर असर जैसी आशंकाएं पैदा हो सकती हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि खनन से मिलने वाला लाभ आखिर किसके हिस्से में जाएगा और इसकी कीमत कौन चुकाएगा?
खेती और जमीन को लेकर सबसे बड़ा सवाल
पुरुंगा और आसपास के गांवों में बड़ी संख्या में ग्रामीणों की आजीविका खेती और जमीन पर निर्भर है। ग्रामीणों की चिंता है कि यदि खनन गतिविधियों का प्रभाव उनकी कृषि भूमि और जलस्रोतों पर पड़ा तो उनके सामने रोजगार का कोई स्थायी विकल्प नहीं रहेगा। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि उनके परिवार की आजीविका, पहचान और आने वाली पीढिय़ों का सहारा है। यदि खनन के कारण जमीन की गुणवत्ता खराब होती है या खेती प्रभावित होती है तो केवल मुआवजा देकर उस नुकसान की भरपाई संभव नहीं होगी।
भूमिगत खदान, लेकिन खतरा जमीन के ऊपर भी!
भूमिगत खदान को अक्सर खुले खनन की तुलना में कम नुकसानदायक बताने की कोशिश की जाती है, लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि क्या भूमिगत खनन से पर्यावरण पर होने वाले सभी प्रभाव समाप्त हो जाते हैं? खनन के दौरान बड़ी मात्रा में पानी के उपयोग, भूजल स्तर में बदलाव, कोयले के परिवहन, सड़क यातायात, धूल और प्रदूषण सहित कई मुद्दों को लेकर ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं। इसके अलावा जमीन के नीचे लगातार खनन से भूगर्भीय संरचना पर पडऩे वाले प्रभाव और भविष्य में जमीन धंसने जैसी संभावनाओं को लेकर भी विशेषज्ञ स्तर पर गंभीर अध्ययन की मांग की जा रही है।
जंगल और जलस्रोतों की सुरक्षा कौन करेगा?
धरमजयगढ़ क्षेत्र पहले से ही अपने जंगल, पहाड़, नदी-नालों और जैव विविधता के लिए जाना जाता है। ऐसे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियां शुरू होने पर प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढऩे की आशंका है। ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि यदि जंगल कटे, जलस्रोत प्रभावित हुए या भूजल स्तर नीचे गया तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? कंपनी द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले दावों की वास्तविकता जमीन पर किस तरह सुनिश्चित की जाएगी, यह भी बड़ा सवाल है।
मुआवजा देकर खत्म नहीं हो सकता ग्रामीणों का अधिकार
ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना के प्रभाव का आकलन केवल जमीन के बदले मिलने वाले मुआवजे से नहीं किया जा सकता। किसी परिवार की जमीन चली जाती है तो उसके साथ उसकी खेती, सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली भी प्रभावित होती है।
जनसुनवाई महज औपचारिकता न बने
ग्रामीणों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल परियोजना की पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर है। ग्रामीणों का कहना है कि जनसुनवाई केवल कागजी प्रक्रिया बनकर नहीं रहनी चाहिए। ग्रामीणों की आपत्तियों और सवालों का जवाब दिए बिना केवल विकास के नाम पर परियोजना को आगे बढ़ाना स्थानीय लोगों के साथ अन्याय होगा।
अब ग्रामीण पूछ रहे हैं, विकास किसके लिए?
पुरुंगा के ग्रामीणों के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कोयला निकल जाएगा, कंपनी को लाभ होगा और क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा, तो स्थानीय ग्रामीणों को इसके बदले वास्तव में क्या मिलेगा? ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें ऐसा विकास नहीं चाहिए जिसकी कीमत उनकी जमीन, जंगल, पानी और भविष्य से चुकानी पड़े। अब शासन-प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह ग्रामीणों की आशंकाओं को गंभीरता से ले और परियोजना से जुड़े सभी तथ्यों को सार्वजनिक करें। कोयला निकालने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि स्थानीय लोगों के अधिकार, पर्यावरण और आने वाली पीढिय़ों का भविष्य सुरक्षित रहे। पुरुंगा के ग्रामीणों का संदेश साफ है, विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो गांव की जमीन छीनकर, जल-जंगल-जमीन को खतरे में डालकर और ग्रामीणों के भविष्य की कीमत पर हासिल किया जाए।








