आदिवासी इतिहास का सबसे लोकप्रिय क्रांतिकारी योद्धा बीर बिरसा मुंडा जिसने तूफानों से लड़ा फिर खड़ा हुआ। इसने शोषण को तोड़ा शासन को मोड़ा, सोना खोदा, लोहा मोड़ा इसके फौलादी हाथ नाग की फन की तरह अपने आदिवासी समाज को अंग्रेजों के जुल्मों से बचाते रहा। बिरसा अपने जवानी को अपना कफन बनाकर अपने ही कब्र की मिट्टी से आने वाली नस्लों के लिए घरौंदा बनाया। इसने अपने लहू के एक-एक कतरा से ऐसा इतिहास लिखा कि आज हरके आदिवासी घर में एक बिरसा पैदा हो रहा है। झारखंड की मिठ्टी में बलिदानों का इतिहास दबा हुआ है। पेड़ों की शखाएं शहादतों की कहानी सुनाती है मौन खड़े पहाड़ शोषण की सहनशीलता को दिखलाता है। बिरसा इन्हीं जुल्मों के खिलाफ उलगुलान का शंखनाद किया था। जिसका नारा था अबुआ राज अबुआ दिशूम। अंग्रेजों का दमन चरम सीमा पर थी चारों तरफ जुल्मों का हहाकार मचा हुआ था। झारखंड की नदियां क्रातिकारियों के लहू से रंग गई थी। जंगल की हरियाली बंजर होते जा रही थी। तब बिरसा मुंडा ने डुबांरी बुरू पहाड़ से सिंह की तरह दहाड़ते हुए हूल (क्रांति) का बिगूल फूंका था। बिरसा का उलगुलान उन्होंने आदिवासियों को ब्रिटिश शोषण और उनके संसाधनों पर कब्जा करने के खिलाफ एकजुट किया उनके प्रयासों ने उनके समुदाय को संगठित किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को बढ़ावा दिया। बिरसा ने बचपन से ही अपने परिवार और आदिवासियों पर अंग्रेजों का जुल्म सहा और देखा। गरीब आदिवासी की खेती योग्य भूमि और जंगली पेड़ों पर अंग्रेजी शासकों का अधिकार था। अंग्रेज आदिवासी लोगों, बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों पर बहुत अत्याचार करते थे। बिरसा मुंडा ने स्थानीय महाजनों, सामंतों और अंग्रेजों की नींद उड़ाए रखा। उन्होंने तीर-धनुष से ही बंदूकों से लैस अंग्रेजों पर तीरों की इतनी बौछार करते थे कि अंग्रेजों को भागना पड़ता था। बिरसा ने आदिवासियों को एकजुट होने और अपना हक वापस पाने के लिए प्रेरित किया। बिरसा मुंडा अपने उलगुलान में पूरी तरह से प्रकृतिक संसाधनों का उपयोग करते थे। संदेश के लिए सखुआ पेड़ का पत्ता, मिट्टी से बने सिम्बल, तीर, पेड़ पर बैठक के रास्ते की दिशा निर्देश बनना आदि। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के उलीहातू गांव में हुआ था। उन्होंने 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश नीतियों और स्थानीय जमीदारों के शोषण के खिलाफ उलगुलान नामक एक महान विद्रोह का नेतृत्व किया। उनका मुख्य उद्देश्य आदिवासी भूमि और संस्कृति की रक्षा करना था। 1894 में उन्होंने लगान माफी के लिए आंदोलन शुरू किया। 1897 से 1900 के बीच, उन्होंने और उनके समर्थकों ने पुलिस स्टेशनों और सरकारी इमारतों पर हमले किए। 1898 में डोम्बारी पहाडिय़ों पर एक विशाल सभा हुई, जो आंदोलन की पृष्ठभूमि बनी। 1895 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था और दो साल जेल में रखा गया था। फरवरी 1900 में उन्हें फिर से गिरफ्तार किया गया और रांची जेल में डाल दिया गया। 9 जून 1900 को, मात्र 25 साल की उम्र में, जेल में उनकी मृत्यु हो गई, जिसके बारे में कहा जाता है कि जहर दिया गया था। उनके संघर्षों के कारण सरकार ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 पारित किया, जिसने आदिवासियों की भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर प्रतिबंध लगा दिया। आज भी उन्हें आदिवासी समुदाय का एक महान नेता और प्रेरणा स्रोत माना जाता है।



