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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, हत्या के आरोप में दोषी सुनिता लहरे को किया बरी, निचली अदालत की आजीवन कारावास की सजा रद्द * प्रशांत डनसेना ने की पैरवी, दो महीने बाद शव निकालकर हुआ था पोस्टमॉर्टम और एफएसएल जांच

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जोहार छत्तीसगढ़-सक्ति।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और चर्चित मामले में सुनिता लहरे को उसकी सास की हत्या के आरोप से दोषमुक्त करार देते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। यह ऐतिहासिक फैसला माननीय उच्च न्यायालय की द्वैधपीठ (डिवीजन बेंच) द्वारा सुनाया गया। इस मामले में प्राथमिकी (स्नढ्ढक्र) आरोपी सुनिता लहरे के ससुर द्वारा दर्ज कराई गई थी, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि अपनी सास की हत्या कर दी थी। उल्लेखनीय है कि मृतका के शव को मृत्यु के लगभग दो महीने बाद जमीन से खुदवाकर बाहर निकाला गया था, जिसके पश्चात पोस्टमॉर्टम और फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (स्नस्रु) द्वारा जांच कराई गई थी। प्रथम दृष्टया परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर निचली अदालत ने सुनिता को दोषी मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को आरोपी पक्ष ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत डनसेना ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि अभियोजन पक्ष के पास हत्या से संबंधित कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं था और पूरे मामले में केवल अनुमान और संदेह के आधार पर कार्यवाही की गई। उन्होंने न्यायालय को यह भी बताया कि शव दो महीने बाद निकाला गया और एफएसएल रिपोर्ट तथा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी स्पष्ट कारणों का अभाव था। उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने अधिवक्ता डनसेना की दलीलों पर सहमति जताते हुए यह पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध अपराध को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य इतने सशक्त नहीं थे कि आरोपी को दोषी ठहराया जा सके। संदेह का लाभ देते हुए कोर्ट ने सुनिता लहरे को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस फैसले से सुनिता लहरे और उसके परिवार को बड़ी राहत मिली है। वहीं अधिवक्ता प्रशांत डनसेना की सशक्त और निष्पक्ष पैरवी की न्यायिक क्षेत्र में प्रशंसा हो रही है। यह निर्णय न्यायिक प्रणाली में विश्वास को और सुदृढ़ करता है, जहां न्याय केवल साक्ष्यों के आधार पर होता है, न कि भावनाओं या अनुमानों पर।

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