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अमेरिका-चीन में टकराव की आशंका

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वाशिंगटन । कई दशकों से ताइवान के मामले में अमेरिका और चीन के बीच तमाम विरोधाभासों के बावजूद शांत बनी हुई है। चीनी नेताओं का कहना है कि केवल एक ही चीन है जिस पर उनका शासन है। ताइवान तो उसका विद्रोही हिस्सा है। अमेरिका केवल एक चीन के विचार से सहमत तो है पर उसने बीते 70 साल यह सुनिश्चित करने में गुजार दिए कि दो चीन हैं। अब इस सामरिक विरोधाभास के टूटने की आशंका है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है, चीन अपनी फौजी ताकत के बूते ताइवान पर कब्जा कर सकता है। ऐसी स्थिति में अमेरिका युद्ध में कूद सकता है। परमाणु हथियारों से लैस दो महाशक्तियों के बीच युद्ध से दुनिया की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। अमेरिका को भय है कि वह लंबे समय तक चीन को ताइवान पर कब्जे से नहीं रोक सकेगा। इंडो-पेसिफिक कमांड के प्रमुख एडमिरल फिल डेविडसन ने मार्च में अमेरिकी कांग्रेस को बताया कि चीन 2027 तक ताइवान पर हमला कर सकता है। युद्ध के विनाशकारी नतीजे होंगे। चीन से 160 किलोमीटर दूर स्थित ताइवान सेमीकंडक्टर का प्रमुख उत्पादक है। ताइवानी कंपनी टीएसएमसी विश्व के 84 फीसदी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक चिप्स बनाती है। टीएसएमसी में उत्पादन रूकने से ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री ठप हो जाएगी। आधुनिक चिप कारों से लेकर कई तरह के उद्योगों में काम आती है। कंपनी टेक्नोलॉजी के मामले में अपने प्रतिद्वंद्वियों से 10 साल आगे है। अमेरिका और चीन को उसकी बराबरी करने में कई वर्ष लगेंगे। चीन और अमेरिका के बीच ताइवान पर लंबे समय से तनातनी चल रही है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार मानती है कि एकीकरण उसका कर्तव्य है, भले ही इसके लिए हमले का सहारा क्यों ना लेना पड़े। हालांकि, अमेरिका पर ताइवान की रक्षा के लिए किसी संधि की बाध्यता नहीं है पर चीन का हमला अमेरिका की सैनिक शक्ति और उसके कूटनीतिक, राजनीतिक संकल्प की परीक्षा होगी। अगर अमेरिका के सातवें बेड़े ने हस्तक्षेप नहीं किया तो चीन रातों-रात एशिया में प्रमुख ताकत बन जाएगा। दुनियाभर में अमेरिका के सहयोगी जान जाएंगे कि वे उस पर निर्भर नहीं रह सकते हैं।

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