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पुरातन परंपराओं की ओर लौटें, नई पीढ़ी को स्वस्थ पर्यावरण प्रदान करें : सुश्री उइके

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रायपुर,। अब समय आ गया है कि हम हम अपनी पुरातन परंपराओं की ओर लौटें साथ ही उसे पूरी तरह क्रियान्वित करें, जिससे हम वातावरण को स्वस्थ, प्रदूषण रहित बनाएं, बीमारियों से बचें और नई पीढ़ी को एक स्वस्थ पर्यावरण प्रदान करें, जिसमें वे प्राकृतिक रूप से जीवन जीएं। यह बात राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके ने आज अखिल भारतीय विश्व गायत्री परिवार द्वारा वर्चुअल रूप से आयोजित प्राकृतिक खेती कार्यशाला के समापन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही।

राज्यपाल ने कहा कि गायत्री परिवार पूरे विश्व कल्याण के लिए प्रतिबद्ध रहा है। इसके लिए अलग-अलग प्रकार के आयोजन करता रहता है। उनका उद्देश्य विश्व में एक पवित्र वातावरण का निर्माण करना, पर्यावरण संरक्षण करना तथा नई पीढ़ी को संस्कारवान बनाना है। प्राकृतिक खेती के लिए ऑनलाईन प्रशिक्षण सराहनीय कार्य है। साथ ही इसका आयोजन ऐसी परिस्थिति में किया गया जब हम सभी ने प्रकृति के अनुकुल कार्य न करने के कारण भयंकर त्रासदी झेली है।

सुश्री उइके ने कहा कि साठ के दशक से हरित क्रांति के लिए अपनाई गई अधिकाधिक रसायनों उर्वरक कीटनाशक एवं खरपतवार नाशकों एवं सिंचाई के उपयोग पर आधारित प्रौद्योगिकी से जहां खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा है, वहीं दूसरी तरफ आधुनिक भारतीय कृषि कई गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। अनावश्यक रूप से रासायनिक खादों और कई तकनीकों का उपयोग के कारण खेती की लागत में कई गुना वृद्धि हुई है। कीटनाशकों की विषाक्तता से उत्पादित अन्न, सब्जी, फल एवं दुग्ध के माध्यम से मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इसका समाधान अब प्राकृतिक संसाधनों का समुचित, नियंत्रित उपयोग एवं पोषण पर आधारित प्राकृतिक खेती से ही संभव हो पाएगा।

राज्यपाल ने कहा कि प्राकृतिक खेती को जीरो बजटिंग खेती की उपमा दी जाती है। प्राकृतिक खेती करने से खेती पर लागत न्यूनतम हो जाती है, क्योंकि यह देशी गाय के गौमूत्र, गोबर तथा अन्य प्राकृतिक उत्पादों पर आधारित है। एक सामान्य प्रशिक्षण के उपरांत कोई भी किसान इसे आसानी से कर सकता है क्योंकि उनके लिए कोई नई चीज नहीं है। यह वही है जो हमारे संस्कृति और परंपराओं में समाई हुई है और कई सालों से इसका उपयोग करते रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मशीनी कृषि के प्रोत्साहन से यद्यपि पशुपालन को धक्का लगा है, परंतु हमारे यहां अभी भी कृषि वेस्ट, वानिकी वेस्ट, पशुओं के वेस्ट, शहरी वेस्ट तथा एग्रोइंडस्ट्रियल वेस्ट के रूप में आर्गेनिक व्यर्थ पदार्थों का बाहरी स्रोत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, जिसे आर्गेनिक मैन्योर में बदला जा सकता है।

राज्यपाल ने ग्रामीण स्वावलंबन पर चर्चा करते हुए कहा कि यह प्रयास किया जाए कि किसान जो फसल का उत्पादन करते हैं वह कच्चे माल के रूप में कारखानों में न जाएं बल्कि गाँव में ही लघु तथा कुटीर उद्योगों के माध्यम से प्रसंस्कृत होकर शहर में जाए। हमारे गांव में ही गौपालन, बकरी पालन, भैंस, मछली, मुर्गा, मधुमक्खी, केंचुआ जैसे इतने कार्य हैं कि ग्रामीण युवाओं को ही नहीं बल्कि शहर के बेरोजगार युवकों को भी गाँव में रोजगार उपलब्ध हो सकता है। इस ओर हमें प्रभावी रूप से कार्य करने की आवश्यकता है। इससे शहर से गाँव की तरफ पलायन होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी सशक्त होगी। इस अवसर पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज हरिद्वार के प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या भी उपस्थित थे।

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